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एक रिश्ता ऐसा भी



एक रिश्ता ऐसा भी
सासुबहू 



लखनऊ की उड़ान में मेरी सीट खिड़की वाली थी। बीच वाली सीट पर एक बुजुर्ग महिला थीं और एकदम किनारे वाली सीट पर एक युवती। जो बुजुर्ग महिला मेरी बगल में थीं, शायद उनकी ये पहली विमान यात्रा थी। वो हैरान होकर कभी छत पर लगी बत्ती की ओर देखतीं, कभी खिड़की की ओर। सीट बेल्ट लगाने में भी उन्हें मुश्किल आ रही थी। पर उनकी बगल में बैठी युवती उनकी लगातार मदद कर रही थी। उन्हें समझा रही थी कि हवाई जहाज में ये होता है, वो होता है। उड़ान से ठीक पहले युवती ने फोन पर किसी से बात की। बीच में बैठी बुजुर्ग महिला ने भी अपना फोन निकाला किसी से बात करने के लिए तो युवती ने समझाया कि अब विमान उड़ान भरने वाला है और ऐसे में फोन पर बात करने की अनुमति नहीं होती, तो अब अपना फोन आप बंद कर दीजिए। बुजुर्ग महिला को फोन बंद करना नहीं आ रहा था, उसने अपना फोन उस युवती को दे दिया, युवती ने फोन को स्विच ऑफ कर दिया। 






मैं हैरान हो कर दोनों महिलाओं के उस रिश्ते को समझने की कोशिश कर रहा था। सिर के ऊपर एक AC चालू थी , बुजुर्ग महिला को थोड़ी ठंड सी लग रही थी। उन्हो़ने अपने बैग से शॉल निकालने की कोशिश की तो बगल में बैठी युवती ने मुझसे अनुरोध किया कि क्या आप ऊपर लगे एसी को बंद कर दे सकते हैं? इन्हें ठंड लग रही है।
मैंने हाथ उठा कर बीच वाले एसी को बंद कर दिया। फिर भी बुजुर्ग महिला ने शॉल ओढ़ लिया था। दोनों महिलाओँ के बीच सौहार्द का व्यवहार देख कर मैं सोच में डूबा था कि इनके बीच किस तरह का रिश्ता होगा? मैंने मन ही मन अनुमान लगा लिया था कि किनारे बैठी युवती इस बुजुर्ग महिला की बेटी होगी। बेटियां ही मां का इतना ख्याल रखती हैं। बहुएं कहां सास का इतना ख्याल रख सकतीं है। 




उड़ान के बीच में खाना आया तो मैंने देखा कि किनारे बैठी युवती ने पहले बुजुर्ग महिला की ट्रे खोली, उस पर उनका खाना लगाया, फिर अपना खाना लिया। बुजुर्ग महिला को शायद प्लेन का खाना समझ में नहीं आ रहा था तो बगल वाली युवती ने बताया कि ये रोल है, शाकाहारी है, आप खा सकती हैं। फिर धीरे-धीरे महिला ने खाना शुरू कर दिया। अब तक मैं आश्वस्त हो चुका था कि ये मां-बेटी हैं। बेटी लखनऊ में नौकरी करती होगी, मां मिलने आई होंगी। बेटी मां को बेटे का सुख दे रही है। 







बेटियां मां की परवाह करती ही हैं, इसमें मेरे लिए कोई कहानी नहीं थी। मैंने चुपचाप अपना खाना खाया। अपने साथ एक पत्रिका लेकर चला था, मैं उसे पढ़ने लगा। पर मेरा मन पत्रिका में बिल्कुल नहीं लग रहा था। जिस तरह वो युवती उस बुजुर्ग महिला की परवाह कर रही थी, उससे मेरे मन में बार-बार ये भाव आ रहा था कि काश मेरी भी एक बेटी होती। मैंने न जाने कितनी बेटियों को मां-बाप की ज़िंदगी में उजाला बनते देखा है। मुझे बार-बार लग रहा था कि बेटे भले अपने मां-बाप की परवाह न करें, पर बेटियां तो हमेशा करती ही हैं। 




बेटियों की कई कहानियों को मैं मन ही मन जीता रहा। और तभी एनाउंस हुआ कि सीट सीधी कर लें, कुर्सी के पीछे लगी ट्रे को बंद कर दें। विमान उतरने वाला है। अब वो युवती उस बुजुर्ग महिला को समझाने लगी कि कुर्सी में लगे इस बटन को दबाने से कुर्सी सीधी हो जाएगी। इस तरह ट्रे को बंद किया जाता है। बुजुर्ग महिला हैरानी और खुशी से सब सीख रही थी।


 मैंने बुजुर्ग महिला से पूछा कि माँ जी  ये आपकी बेटी हैं न? बुजुर्ग महिला ने मेरी ओर देखा। मुस्कुराईं। फिर धीरे से बोलीं, बेटा “ये मेरी बहू है” बहू? मैं पल भर को चौंका। बुजुर्ग महिला ने मेरी ओर देख कर बिना पूछे ही कहा, “समय बदल रहा है बेटा। अब सास-बहुओं के बीच वही रिश्ता नहीं रह गया है, जो पहले हुआ करता था। आप पुराने ज़माने की सोच रहे हो। ये नया ज़माना है। अब रिश्ते दोस्ती में बदल गए हैं। सास, बहू, बेटी, देवरानी, जेठानी, ननद, भाभी पति, पत्नी ये सब अब संबोधन के शब्द भर रह गए हैं। असल चीज़ है दोस्ती का रिश्ता।

Udau Raj Singh


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Kushinagar Jagran

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